Learn Bhagwad Geeta 2/62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

इस श्लोक का अर्थ है: विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्ति के दुष्परिणाम के बारे में बताया है।)

सनातन धर्म के उपरांत जो धर्म पैदा हुए उनमे जनता को वासना, स्वर्ग, सुख ,भोग ,अधिकार ,सत्ता ,सम्राज्य विस्तार,बल (शक्ति मद) अदि विषयों में आसक्ति के बारे में लालच फैलाया गया।  लोगों को नई प्रकार की विषय सुविधा में रूचि हुई और पुराने सम्प्रदाय को त्यागना जारी रहा। दुनिया में लगभग सभी शताब्दी में नए सम्प्रदाय का जन्म हुआ। पुराने सम्प्रदाय में परिवर्तन जारी है ।
समय अनुसार कामनाओं की पूर्ति में अनेक प्रकार के विघ्न आने से क्रोध उत्पन्न होता है इसी से आतंकवाद ,नव कट्टरवाद ,नई जातियों,नए सम्प्रदाय का जन्म होता है।
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार अदि विषयों में जितना मनुष्य चिंतन करता  है उतना ही वह उसमें सम्मिलित होकर दुष्परिणाम सामने लाता  है।
अपनी कामना पूर्ति के लिए जात ,पंथ,सम्प्रदाय ,लिंग,क्षेत्र ,परिवार का गलत  सहारा लेने के लिए भी तैयार रहता है भले ही उससे अन्य लोगों से अन्याय हो जाए।जो इसमें बाधा पैदा करे वह दुश्मन लगता है। सभी कानून भी मनुष्य सुविधानुसार बनाता है चाहे उससे लिंगभेद,जातिभेद ,सम्प्रदायभेद ,क्यों ना हो ?
अतः गीतानुसार शांत और प्रसन्न रहने के लिए  विषयों का चिंतन न करें। 

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