Bhagwad Geeta 2/41

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌ ॥
भावार्थ :  हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं॥
दुनियां का एक मात्रा ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता ही यह घोषणा करता है कि कर्मयोगी की निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है। लेकिन यदि विवेकहीन मनुष्य की बुद्धि बहुत भेद वाली होती है।
उदाहरण के लिए हमारे देश में भेद बुद्धि के कारण व्यक्ति निंदक ,उदास ,भयभीत,शंकालु बनता है।
लोग भगवदगीता को नहीं जानते, मानते इसीलिए प्रसंन्न नहीं रह सकते। पूरी दुनियां के १५० देशों की प्रसन्नता के रेंक में भारत का स्थान १४० वां है। आप तर्क देंगे कि दूसरे देशों के लोग भी तो श्री गीता विहीन है फिर ऊपर का रेंक कैसे ? देखिये हमारे पास उच्च विचार संकल्प सूत्र १००० है तो विकल्प भी १००० कर देते है प्रयोगशाला  की आदत नहीं है ,विदेशियों का झूठ भी मान लेते हैं । उससे भेद बुद्धि ज्यादा कमजोर होगी। विदेशियों के पास १० संकल्प सूत्र है और वह प्रयोग करके विकल्प नहीं करते जिससे प्रसन्नता रेंक अधिक हो जाता है।
उदाहरण के लिए यदि मुग़ल ,अंग्रेज बोले की फलां जाती वाले   ये करे /पढ़े  तो मुस्लिम,ईसाई बन जायेंगे ,तुरंत मान लेते हैं । 
गुरु /संत बोले कि फलां जाती वाले   ये करे /पढ़े  तो तो ब्राह्मण ,क्षत्रिय , देव स्वरूप बन जायेंगे ,लेकिन वो तो अपनी जाती पकड़े रखते हैं। 

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