Wah Bhagwad Geeta 2/62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
इस श्लोक का अर्थ है: विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्ति के दुष्परिणाम के बारे में बताया है।)
१) संसार में मनुष्य जब उन  वस्तुओं ,सत्ता ,विलास ,के बारे में सोचता रहता है जो उसके पास नहीं है और वह कामना ,आसक्ति पैदा कर  देती है ,यदि उसमे व्यवधान पैदा हो तो क्रोध आता है। इसी का परिणाम युद्ध ,आतंकवाद ,अपराध प्रवृति होती है। 
२) विषयों में आसक्त व्यक्ति अपनी इच्छा पूर्ति के लिए क्रोधी एवं हिंसक स्वभाव वाला बन जाता है और लूट -खसूट,शोषण,भेदभाव के कानून नियम बनाता रहता है। वही शोषण के कानून,सम्प्रदाय पूरी दुनियां को प्रभावित करता है। 
३ ) पूरी दुनियां में छा जाने की कामना भी  हिंसक क्रोध को जन्म देती है उसी का परिणाम विध्वंसक हथियारों का विकास किया जा रहा है। 

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