मन्दिरों की संपत्ति

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री श्री चव्हाण जी सरकार को राय दी है कि मंदिरों का सोना अधिग्रहण करने के बाद इससे संकट काल में कमाई करे।  मंदिरों के महंतों को मै आगाह करता हूँ कि ये राजनैतिक दल सबसे अधिक दानकर्ता हिन्दुओं के मंदिरों की संपत्ति पर गिद्ध दृष्टि इसलिए है कि क्योंकि आप लोग तयाग की प्रतिमूर्ति संतों और साधुओं और सनातनी आश्रमों को अलग समझते हैं। इष्ट  मंदिरों के कल्याणों की कोई जिम्मेवारी नहीं डालते। तयाग की प्रतिमूर्ति  सन्यासी, अखाड़ों के ब्रह्मचारियों ,योगियों को शामिल नहीं करते ।  एरा -गेरा  दबाव ग्रुप  ,नेताओं ,प्रशासकों  ,भाई भतीजों का ट्रस्ट में बोल-बाला होता है।  ये ट्रस्टी सरकार के अन्याय के विरुद्ध  जुबान खोलने का साहस नहीं करते। इसलिए मंदिर की  संपत्ति ,सोना सरकार द्वारा कमाई का साधन बनाने को कहते हैं।

१)अतः मंदिर की आय से सस्ती धार्मिक किताबें छपवानी चाहिए जो गीता प्रैस गोरखपुर कर रहा है।


२) अपने कल्याणों ( वो परिवार जिन्होंने जमीन दान दी वो परिवार ,मंदिर बनाने में  तन /वस्तु /धन लगाया और जिनका इष्ट वह देवता है परिवारिक कशरी /कर देने  का  विधान है)/ वह परिवार जिन्हे मंदिर प्रतिष्ठा के समय  हजारों /सैंकड़ों / दशकों पहले पुरोहित , पुजारी , बाजकी , पलघार ,भण्डारी , संगीत - वादक , चौकीदारी नियुक्त ।


३) मन्दिर /ट्रस्टों को  अपने समाज के निर्धन  कल्याणों के उत्थान के लिए यथायोग्य भेंट दें। जैसे संत श्री आसारामजी आश्रम द्वारा गरीबों के लिए योजना  ,पूजा -कीर्तन करो ,भोजन- दक्षिणा पाओ।


४) योग शिवर लगाओ जैसे  बाबा रामदेव जी पतंजलि के अंतर्गत लगते हैं।


५) बाल संस्कार , ध्यान योग  शिविर , गुरुकुल का संचालन  करो  जैसे संत श्री आसारामजी आश्रम चला रहे हैं।


 वरन ये सरकारें पढ़ा रही है कि आर्य विदेश  से आये  और हमारे मंदिरों के ट्रस्टियों , महंतों , पुजारियों के पास अपने यजमानों / कल्याणों तक का डाटा बेस नहीं हैं।  गया , हरिद्वार , धामों  अदि के पुरोहित  कुछ रखते भी हैं परन्तु उसे  सरकारों ने मान्यता या सहूलियत नहीं दी। 

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